उदारवाद - 

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका केेे अनुसार, उदारवाद एक विचार है जो सरकार की नीति और पद्धति के रूप में, समाज के एक संगठनात्मक सिद्धांत के रूप में और व्यक्ति तथा समुदाय के लिए जीवन की शैली के रूप में स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है।

उदारवाद की कुछ विशेषताएं भी हैं जैसे -

(1) सभी मनुष्य समान हैं। मनुष्य, मूल्य एक अच्छा और सामाजिक प्राणी है। 

(2) व्यक्ति को अपने विकास के लिए कुछ अधिकार चाहिए, जिन्हें किसी भी स्थिति में छीना नहीं जा सकता।

(3) कानून सर्वोच्च है।

(4) वह सरकार अच्छी है जो व्यक्ति के जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप करें।

(5) व्यक्ति और राज्य का संबंध परस्पर समझौते पर आधारित है।

सामाजिक संदर्भ में, उदारवाद का आग्रह है कि मनुष्य को धर्म और नैतिकता के संदर्भ में स्वतंत्रता प्राप्त हो।

आर्थिक संदर्भ में, उदारवाद मुक्त व्यापार और उत्पादन की स्वतंत्रता का पक्षधर है।

राजनीतिक क्षेत्र में, शक्तियों के पृथक्करण, स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव शासित के प्रति शासकों के उत्तरदायित्व, व्यस्क मताधिकार, प्रेस तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा तथा विचारों एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है।

जॉन लॉक को उदारवाद का जनक कहा जाता है। लोक ने सरकार को समाज की सहमति पर आधारित माना। उसने सीमित सरकार का सिद्धांत प्रतिपादन किया। उसके अनुसार सरकार एक न्यास/विश्वास है।

आर्थिक क्षेत्र में एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो तथा माल्थस ने उदारवाद को पुष्प पल्लवित किया। इसने मुक्त व्यापार तथा स्वयं नियमित बाजार प्रणाली का समर्थन किया जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण न हो। उनका मानना था कि मुक्त बाजार प्रणाली मुक्त प्रतिद्वंदिता को जन्म देगी, इससे मूल्य में गिरावट आएगी, व्यापार बढ़ेगा और बाजार में खुशहाली आएगी। 

राजनीतिक क्षेत्र में, नकारात्मक उदारवाद ने राज्य को एक कृत्रिम संस्था माना, जिसका निर्माण व्यक्तियों के द्वारा अपने निश्चित हेतु तथा उद्देश्यों की पूर्ति की दृष्टि से किया गया है। राज्य में अनिवार्य बुराई है इसे कम से कम कार्य करना चाहिए। व्यक्ति को जीवन के सभी क्षेत्रों में अधिकतम हस्तक्षेप विहीन स्वतंत्रता प्राप्त होने चाहिए।

आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद का चरण 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित हुआ। जॉन गेलब्रेथ ने इसे औद्योगिक राज्य का सिद्धांत तथा टेकर ने इसे सुधारवादी उदारवाद के नाम से संबोधित किया। 

19वीं शताब्दी के आते-आते पूंजी के केंद्रीय करण ने एकाधिकार वादी प्रवृत्तियों को जन्म दिया। औद्योगिक विकास के तीर गति ने स्वतंत्रता के नारे को कुछ पूंजी पतियों के विशेष अधिकारों में परिवर्तित कर दिया। परिणाम यह हुआ कि औद्योगिक विकास से जन्मे श्रमिक वर्ग पर तीव्र अत्याचार होने लगे। इसी के समानांतर मार्क्स के विचारों के प्रभाव में श्रमिक वर्ग क्रम से संगठित होता जा रहा था। 

ऐसी स्थिति में उदारवाद के औचित्य को बरकरार रखने के लिए इसमें संशोधन अपरिहार्य हो गया। यह कार्य जे एस मिल और टी एच ग्रीन ने संपन्न किया। इसी संशोधित विचारधारा को सकारात्मक उदारवाद के नाम से जाना जाता है। सकारात्मक उदारवाद ने सार्वजनिक हित के पक्ष में व्यक्ति की स्वतंत्रता में राज्य के हस्तक्षेप का समर्थन किया। ग्रीन ने अज्ञानता, नशाखोरी और भिक्षावृत्ति के उन्मूलन में राज्य की सकारात्मक भूमिका का आग्रह किया। सकारात्मक उदारवाद नहीं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।


मार्क्सवाद - 
कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक माना जाता है। इसमें उसके मित्र फ्रैडरिक एंजेल्स का विशेष योगदान है। मार्क्स ने पहली बार यह व्याख्याकित किया कि आर्थिक संबंधों जिससे उसका आशय उत्पादन की शक्तियों और वितरण की प्रणाली से है - में बदलाव से समाज के स्वरूप में बदलाव आ जाता है।
मार्क्स की पद्धति द्वंदात्मक भौतिकवाद की है। धन्यवाद की परिधि मार्क्स ने हीगेल से ग्रहण की, परंतु हीगेल के विपरीत मार्क्स का यह मानना है कि सृष्टि में एकमात्र वास्तविकता पदार्थ है न कि भाव। मार्क्स के अनुसार, भौतिक जगत में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। परिवर्तनों की यह प्रक्रिया सीधी रेखा में नहीं, द्वंद्वात्मक शैली में होती है। परिवर्तन केवल परिणामपरक नहीं होता वरन् परिणामपरक परिवर्तनों की प्रक्रिया गुणात्मक परिवर्तन को जन्म देती है। द्वंदात्मक भौतिकवाद की प्रक्रिया का मार्क्सवाद वाद, प्रीति-वाद और संवाद की अवधारणाओं से स्पष्ट करता है।
मार्क्स के अनुसार, किसी भी समाज में विद्यमान आर्थिक संबंध उस समाज के आधार या अधो-संरचना का निर्माण करते हैं। इसी पर उस समाज की ऊपरी संरचना जिसमें साहित्य, कला, दर्शन, राज्य और विचारधारा सम्मिलित है - आधारित होती है।
आर्थिक संबंधों में परिवर्तन से समाज का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। मार्क्स लिखता है की पवन-चक्की सामंती अधिपतियों से युक्त समाज को जन्म देती है, जबकि वाष्प-चक्की औद्योगिक पूंजीपति संयुक्त समाज को।
मानव समाज के पहले चरण को यह आदिम साम्यवादी युग कहता है। इस युग में कोई उत्पादनकारी गतिविधि नहीं थी। अतः व्यक्तिगत संपत्ति तथा वर्ग नहीं था। 
कृषि के ज्ञान से उत्पादनकारी गतिविधि की शुरुआत हुई और दास युग का जन्म हुआ। व्यक्तिगत संपत्ति का जन्म हुआ और समाज दो वर्गों में बट गया - कृषक वर्ग और दास वर्ग।
तीसरा युग सामन्तवादी युग था। इस युग में एक और सामन्त और बड़े कृषक थे, तथा दूसरी और छोटे कृषक और अर्ध-कृषक दास थे।इस युग में स्वतंत्र दस्तकारों का जन्म हुआ।
मशीनों के अविष्कार ने उत्पादन प्रणाली में अमूल्य परिवर्तन कर दिया। अब समाज में पूंजीपति और सर्वहारा दो वर्ग हो गए।
पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिकों के शोषण को व्याख्याकित करने के लिए मार्क्स 'अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत' देता है। अतिरिक्त मूल्य से उसका तात्पर्य उस मूल्य से है जो श्रमिक के श्रम का परिणाम है, परंतु जिसे पूंजीपति हड़प लेता है।
मार्क्स मूल्य के श्रम सिद्धांत का पक्षधर है। उसके अनुसार किसी वस्तु का मूल्य उस समयकाल के आधार पर निर्धारित होना चाहिए जो उसके उत्पादन में औसतन लगता है।

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